सुलतानपुर। पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे और इस्लाम धर्म के महान शहीद हजरत इमाम हुसैन की याद में मनाए जाने वाले मोहर्रम पर्व को लेकर जिले में तैयारियां तेज हो गई हैं। मुस्लिम समुदाय 26 जून को मनाए जाने वाले मोहर्रम के अवसर पर पूरी श्रद्धा और अकीदत के साथ जुटा हुआ है। चांद दिखाई देने के साथ ही ताजिया निर्माण का कार्य अंतिम चरण में पहुंच गया है और कारीगर दिन-रात मेहनत कर ताजियों को आकर्षक स्वरूप देने में लगे हुए हैं।
मोहर्रम कमेटी के पदाधिकारियों के अनुसार, जिले के विभिन्न क्षेत्रों में ताजिया बनाने वाले कारीगर रातभर काम कर रहे हैं ताकि निर्धारित समय से पहले ताजियों का निर्माण कार्य पूरा किया जा सके। भदैया क्षेत्र समेत आसपास के दर्जनों गांवों में ताजियों की खरीदारी भी शुरू हो चुकी है और लोग अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार तैयारियों में जुट गए हैं।
ताजियों की दुकानों पर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस धार्मिक आयोजन की तैयारियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। स्थानीय बाजारों में भी मोहर्रम से जुड़ी सामग्री की मांग बढ़ने से रौनक देखने को मिल रही है।
मोहर्रम पर्व को सकुशल एवं शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए कोतवाली देहात परिसर में शांति समिति की बैठक आयोजित की गई। बैठक में पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने ताजियादारों और क्षेत्र के सम्मानित लोगों से आपसी सौहार्द बनाए रखने की अपील की। अधिकारियों ने कहा कि सभी लोग प्रशासन का सहयोग करें ताकि पर्व शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हो सके।
हनुमानगंज जामा मस्जिद के मौलाना शाह आलम ने मोहर्रम के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मोहर्रम के शुरुआती दस दिन कर्बला के शहीदों की याद में मातम और गम के प्रतीक माने जाते हैं।
उन्होंने कहा कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने यज़ीद के अन्याय, अत्याचार और जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई थी। सत्य और इंसाफ की रक्षा के लिए उन्होंने अपने परिवार और साथियों के साथ कर्बला के मैदान में शहादत दी, जिसकी याद में दुनिया भर के मुसलमान मोहर्रम मनाते हैं।
मोहर्रम के दौरान विभिन्न स्थानों पर मजलिसों का आयोजन किया जाता है, जहां कर्बला की घटना का वर्णन किया जाता है। श्रद्धालु काले वस्त्र धारण कर नौहा और मर्सिया पढ़ते हैं तथा इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते हैं।
मोहर्रम की 10वीं तारीख, जिसे आशूरा कहा जाता है, के दिन ताजियों को पूरे सम्मान के साथ जुलूस के रूप में निकाला जाता है। इसके बाद ताजियों को स्थानीय कर्बला या कब्रगाहों में ले जाकर सुपुर्द-ए-खाक किया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर शहीद-ए-कर्बला को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
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