सुलतानपुर। जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में आयोजित वार्षिक ‘जलसा शुहदा-ए-इस्लाम’ की तीसरी मजलिस शुक्रवार को अत्यंत श्रद्धा, सम्मान और रूहानियत के माहौल में सम्पन्न हुई। मजलिस में देश के प्रतिष्ठित उलमा-ए-किराम ने इस्लाम की बुनियादी शिक्षाओं, सहाबा-ए-किराम की महानता और अकाबिरीन की कुर्बानियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लेकर अपने ईमानी जज़्बात का इज़हार किया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ जामिया इस्लामिया के छात्र मोहम्मद यासिर इलाहाबादी की तिलावत-ए-कुरआन से हुआ। उनकी मधुर तिलावत ने पूरे माहौल को रूहानी रंग में रंग दिया। इसके बाद मोहम्मद फ़ैज़ान फ़िरोज़पुरी और अब्दुल हादी ने नाअत व मनक़बत पेश कर उपस्थित लोगों को भावविभोर कर दिया। वहीं मोहम्मद याक़ूब मीरानपुरी ने हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) की शान में मनक़बत प्रस्तुत की, जिसे उपस्थित लोगों ने बेहद सराहा।
मजलिस के दौरान मोहम्मद अहमद प्रतापगढ़ी ने “अज़मत-ए-सहाबा” विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए सहाबा-ए-किराम के जीवन, उनके त्याग और इस्लाम की रक्षा में उनके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सहाबा-ए-किराम का जीवन आज भी पूरी उम्मत के लिए आदर्श और प्रेरणा का स्रोत है।
जलसे की सदारत जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर के नाज़िम-ए-आला मौलाना मोहम्मद उस्मान क़ासमी ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने दारुल उलूम देवबंद की स्थापना, उसके उद्देश्यों और संस्थापकों की दीनी सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इस्लाम की बुनियाद सत्य और न्याय पर आधारित है।
उन्होंने कुरआन की प्रसिद्ध आयत “जाअल हक़ व ज़हक़ल बातिल, इन्नल बातिल काना ज़हूका” का हवाला देते हुए कहा कि सत्य हमेशा कायम रहता है, जबकि असत्य का अंत निश्चित होता है। उन्होंने युवाओं से इस्लामी शिक्षाओं को अपनाने और समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दारुल उलूम देवबंद के नायब मोहतमिम मौलाना मोहम्मद राशिद आज़मी रहे। उन्होंने अपने विस्तृत और प्रभावशाली बयान में कहा कि सहाबा-ए-किराम की सीरत के बिना पैगम्बर हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सीरत को पूर्ण रूप से समझा नहीं जा सकता।
उन्होंने ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन के जीवन, उनके त्याग, सेवा, दानशीलता और इस्लाम के लिए किए गए महान योगदानों पर विस्तार से चर्चा की। मौलाना राशिद आज़मी ने हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ि.), हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.), हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) तथा हज़रत अमीर मुआविया (रज़ि.) की सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सहाबा-ए-किराम से मोहब्बत और उनका सम्मान ईमान का अहम हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि सहाबा का ज़िक्र इंसान के दिल में आध्यात्मिक ऊर्जा, ताज़गी और रोशनी पैदा करता है। उनकी महानता और उनके उच्च चरित्र का प्रमाण कुरआन और हदीस दोनों में स्पष्ट रूप से मिलता है।
अपने संबोधन के दौरान मौलाना राशिद आज़मी ने मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह साहब के एक प्रसिद्ध फ़तवे का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी स्थान पर सहाबा-ए-किराम की प्रशंसा और सम्मान को रोकने का प्रयास किया जाए, तो ऐसे समय में उनके फ़ज़ाइल और महानता को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना आवश्यक हो जाता है।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को इस्लामी इतिहास, सहाबा-ए-किराम के जीवन और उनके आदर्शों से परिचित कराना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
कार्यक्रम का समापन मौलाना मोहम्मद राशिद आज़मी की भावपूर्ण दुआ पर हुआ। अंत में जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर के नाज़िम-ए-आला मौलाना मोहम्मद उस्मान क़ासमी ने सभी अतिथियों, उलमा-ए-किराम, छात्रों एवं उपस्थित जनसमूह का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने आगामी मजलिसों में भी अधिक से अधिक लोगों से समय पर शिरकत करने की अपील की। इस अवसर पर क्षेत्र के अनेक प्रतिष्ठित उलमा, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता एवं बड़ी संख्या में आमजन उपस्थित रहे।
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