सुलतानपुर। उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में स्थित लोहरा भवानी मंदिर (Lohra Bhavani Temple Sultanpur) अपनी अनोखी परंपराओं, गहरी आस्था और चमत्कारी मान्यताओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यह मंदिर न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं बल्कि आसपास के जिलों—अमेठी, रायबरेली, प्रतापगढ़, अयोध्या और जौनपुर के लोगों के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
इस मंदिर की सबसे खास बात इसकी अनूठी परंपरा है। जहां आमतौर पर मंदिरों में बूंदी या लड्डू का प्रसाद चढ़ाया जाता है, वहीं लोहरा भवानी मंदिर में भक्त कड़ाही चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं। यहां विशेष रूप से माता रानी को हलवा-पूड़ी का प्रसाद अर्पित किया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से यहां दर्शन करने आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता।
स्वयंभू प्रतिमा और 400 साल पुराना इतिहास
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह प्राचीन मंदिर 400 वर्ष से अधिक पुराना है। यहां विराजमान माता की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है और पिंड रूप में स्थापित है। मंदिर का निर्माण लखौरी ईंटों से किया गया था, जो इसकी ऐतिहासिकता को दर्शाता है। मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1983 से 1992 के बीच पंडित सरयू प्रसाद मिश्र, पंडित लालता प्रसाद तिवारी और अन्य श्रद्धालुओं द्वारा कराया गया। इसके बाद से मंदिर की भव्यता और भी बढ़ गई।
हर सोमवार और शुक्रवार लगता है मेला
लोहरा भवानी मंदिर में प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को साप्ताहिक मेला लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। वहीं सावन मास में नागपंचमी और रक्षाबंधन के बीच पड़ने वाले शुक्रवारों को विशेष भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
मार्बल से प्रकट हुआ मां का नया स्वरूप
मंदिर परिसर लगभग 15 बिस्वा क्षेत्र में फैला हुआ है। वर्ष 2000 में जब मंदिर में मार्बल लगाया गया, तो उसके जॉइंट से मां विंध्यवासिनी का नया स्वरूप प्रकट होने की मान्यता है, जिसे भक्त चमत्कार के रूप में देखते हैं। मंदिर के गर्भगृह का गुंबद काफी ऊंचा है और दीवारों पर धार्मिक श्लोक अंकित हैं। यहां वर्ष की दोनों नवरात्रि में नवमी तिथि को सामूहिक हवन का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
कैसे पहुंचे लोहरा भवानी मंदिर?
लोहरा मऊ गांव स्थित यह मंदिर सुलतानपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 6 किलोमीटर दूर लखनऊ-वाराणसी हाईवे पर स्थित है। पयागीपुर से यह स्थान करीब 3 किलोमीटर पूर्व दिशा में पड़ता है, जहां सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
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