प्रतापगढ़। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में सई नदी के तट पर स्थित मां बेल्हा देवी मंदिर (Belha Devi Temple) हिंदू आस्था, संस्कृति और विश्वास का एक प्रमुख केंद्र है। सदियों पुराना यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी मान्यताओं और चमत्कारों के लिए भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद अवश्य पूरी होती है।
मां बेल्हा देवी (Belha Devi Temple) के इस पावन धाम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कई भक्त नियमित रूप से यहां माता के दर्शन करते हैं। नवरात्र के अवसर पर मंदिर में विशेष सजावट की जाती है और मां के विभिन्न स्वरूपों का भव्य श्रृंगार होता है। मंदिर में प्रतिदिन सुबह और रात्रि में आरती आयोजित होती है, जिसमें श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा से भाग लेते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बेल्हा देवी मंदिर (Belha Devi Temple) को शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त है। कहा जाता है कि यहां माता सती का कमर (बेला) भाग गिरा था, जिससे इस स्थान की पवित्रता और अधिक बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार को यहां विशेष मेला लगता है, जिसमें आसपास के जिलों के साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान यहां भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है।
बेल्हा देवी मंदिर से जुडी पौराणिक कहानियां व इतिहास
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाएं भी इसकी महत्ता को दर्शाती हैं। मान्यता है कि भगवान राम ने वनवास के दौरान राम वनगमन मार्ग पर स्थित इसी स्थान पर सई नदी पार की थी और यहां पूजन कर अपने संकल्प को पूर्ण करने की शक्ति प्राप्त की थी। वहीं, एक अन्य कथा के अनुसार चित्रकूट से अयोध्या लौटते समय भगवान राम के भाई भरत ने भी यहां पूजा-अर्चना की थी।
इतिहास के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण अवध के राजा प्रताप बहादुर सिंह द्वारा वर्ष 1811-15 के बीच कराया गया था और इसे तत्कालीन अवध राज्य का संरक्षण प्राप्त था। मंदिर के गर्भगृह में मां बेल्हा देवी की पूजा पिंडी (पत्थर के रूप) में की जाती है, जबकि ऊपर संगमरमर की आकर्षक प्रतिमा स्थापित है, जिसे सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सजाया जाता है।
मंदिर परिसर में भक्तों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया है। गर्मियों में मंदिर सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक और सर्दियों में सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश और निकास की अलग व्यवस्था है। मंदिर परिसर में लाल पत्थर का विशाल प्रांगण बनाया गया है, जहां भक्त अपनी बारी का इंतजार करते हैं।
बताया जाता है कि बेल्हा देवी के इस मंदिर के साक्ष्य के रूप में उस समय का एक पवित्र शिलालेख भी यहां मौजूद था, लेकिन मुगल काल के दौरान उसे नष्ट कर दिया गया था। इसी प्रकार कई अन्य जन श्रुतियां भी यहां प्रचलित हैं। जबकि हमारे आधुनिक इतिहासकार बेल्हा देवी के इस मंदिर को लेकर कुछ और ही तर्क देते हैं। प्राचीन इतिहास के हमारे एक प्रोफेसर पीयूषकांत शर्मा एक तथ्य यह भी देते हैं कि चाहमान वंश के राजा पृथ्वीराज चैहान की बेटी का नाम भी बेला था। उसका विवाह इसी क्षेत्र के ब्रह्मा नामक युवक से हुआ था। लेकिन, बेला के गौने के पहले ही उसके पति ब्रह्मा की मृत्यु हो गई थी जिसके कारण बेला ने सई किनारे इसी स्थान पर खुद को सती कर लिया और तभी से इस स्थान को सती स्थल कहा जाने लगा।
समय के साथ-साथ बेल्हा माई का यह स्थान मंदिर के रूप में बदल गया। और क्योंकि यहां बेला ने खुद को सती कर लिया था इसलिए इसे सती मंदिर कहा जाने लगा जो बाद में शक्तिपीठ के तौर पर देखा जाने लगा। इसलिए कुछ विद्वान और जानकारी इस मंदिर को एक शक्तिपीठ के रूप में नहीं बल्कि सिद्धपीठ के रूप में देखते हैं।
मंदिर की निर्माण शैली
वास्तु और निर्माण शैली के नजरिए से बेल्हा माई का यह मंदिर उत्तर मध्यकाल में बना हुआ लगता है। पुरातात्विक आधार पर भले ही इन तथ्यों के प्रमाण नहीं मिलते हैं लेकिन आस्था और मान्यताओं के आधार पर देखें तो मां बेल्हा क्षेत्रवासियों के हृदय में सांसों की तरह बसी हुई हैं। मंदिर से जुड़े पौराणिक अवशेष न मिलने के कारण इसका पुरातात्विक निर्धारण अभी नहीं हो सका है। लेकिन, फिर भी पुरात्तव विभाग का प्रयास जारी है।
प्रत्येक शुक्रवार और सोमवार को इस क्षेत्र के ही नहीं बल्कि दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर माता का दर्शन पूजन करते हैं और बच्चों का मुंडन कराते हैं। नवरात्री तथा अन्य विशेष अवसरों पर यहां लोगों की अपार भीड़ मां के दर्शन को पहुंचता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं और भक्तों का माानना है कि माता रानी के समक्ष सच्चे मनसे मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
प्रतापगढ़ क्षेत्र का महत्व
प्रतापगढ़ जिला एतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से काफी महत्तवपूर्ण माना जाता है। यह धरती महात्मा बुद्ध की तपोस्थली भी रह चुकी है। जबकि, इसको रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि आचार्य भिखारीदास और हरिवंश राय बच्चन की जन्मस्थली के नाम से भी जाना जाता है। प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख जिला है जो सन् 1858 में अस्त्तिव में आया था। जिले के अधिकांश भू-भाग से होकर बहने वाली सई नदी के तट पर नगर की अधिष्ठात्री मां बेल्हा देवी का भव्य मंदिर होने के कारण वर्तमान प्रतापगढ़ जिले को अपने पौराणिक नाम बेला अथवा बेल्हा के नाम से भी जाना जाता है।
बेल्हा देवी मंदिर कैसे पहुंचे
मां बेल्हा देवी मंदिर इलाहाबाद-फैजाबाद मार्ग पर स्थित है। इलाहाबाद-फैजाबाद मार्ग के निकट ही सई नदी के तट पर स्थित है मां बेल्हा देवी का भव्य मंदिर। इलाहाबाद से इस मंदिर की दूरी लगभग 65 किलोमीटर है। जबकि लखनऊ से यह 175 किलोमीटर दूर है। रेलवे मार्ग से जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रतापगढ़ के रेलवे स्टेशन से इस मंदिर की दूरी मात्र 2 किलोमीटर है और प्रतापगढ़ के रोडवेज बस अड्डे से इसकी दूरी 3 किलोमीटर है। दोनों ही स्थानों से मंदिर तक पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा और साइकल रिक्शे की सुविधा मिल जाती है।
