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सोनावा से चांदा तक झोलाछाप डॉक्टरों का जाल, सीज नर्सिंग होम दोबारा खुलने पर उठे सवाल

सुलतानपुर। जिले के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। सोनावा चौराहा, कोइरीपुर, पी.पी. कमैचा और चांदा बेल्ट में इन दिनों झोलाछाप डॉक्टरों और अवैध नर्सिंग होम्स का नेटवर्क तेजी से फैलता नजर आ रहा है। योग्य चिकित्सकों और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का फायदा उठाकर कथित “बंगाली डॉक्टर” और बिना मान्यता वाले क्लीनिक खुलेआम मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन अवैध क्लीनिकों में बिना किसी वैध डिग्री, पंजीकरण या स्वास्थ्य विभाग की अनुमति के इलाज किया जा रहा है। गंभीर बीमारियों से लेकर प्रसव और बच्चों के इलाज तक का काम ऐसे लोगों द्वारा किया जा रहा है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि मजबूरी में लोग इन क्लीनिकों का सहारा लेने को विवश हैं, क्योंकि क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं।

सीज नर्सिंग होम फिर चालू होने पर सवाल

हाल ही में चांदा क्षेत्र के एक निजी नर्सिंग होम को बिना लाइसेंस संचालन और एक मासूम बच्चे की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा सीज किया गया था। कार्रवाई के दौरान विभाग ने सख्ती दिखाने का दावा किया था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वही नर्सिंग होम दोबारा संचालित होता दिखाई दिया।

इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि सीज किए गए अस्पताल दोबारा आसानी से खुल जाते हैं, तो विभागीय कार्रवाई सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाती है। लोगों का आरोप है कि समय-समय पर छापेमारी तो होती है, लेकिन उसका स्थायी असर नहीं दिखाई देता।

ग्रामीण इलाकों में बढ़ रहा खतरा

सोनावा से लेकर चांदा तक कई ऐसे क्लीनिक और नर्सिंग होम संचालित हो रहे हैं, जहां न तो पर्याप्त चिकित्सीय संसाधन हैं और न ही प्रशिक्षित स्टाफ। इसके बावजूद मरीजों को भर्ती कर इलाज किया जा रहा है। कई बार गलत इलाज और लापरवाही के मामले भी सामने आते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह पाती।

क्षेत्रीय लोगों ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि अवैध क्लीनिकों और फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ अभियान चलाकर कठोर कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो भविष्य में बड़े हादसे हो सकते हैं।

अब निगाहें जिला स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस गंभीर मुद्दे पर कितनी संवेदनशीलता दिखाते हैं और क्या वास्तव में लोगों को सुरक्षित व भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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Suyash Chitranshi
Suyash Chitranshi