सुलतानपुर। जिले की बल्दीराय तहसील से सरकारी अभिलेखों में बड़ी लापरवाही और प्रशासनिक चूक का मामला सामने आया है। यहां एक जीवित व्यक्ति को राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया था। हैरानी की बात यह है कि यह गलती एक-दो दिन नहीं बल्कि पूरे चार वर्षों तक सरकारी फाइलों में दर्ज रही। आखिरकार तहसीलदार की अदालत में हुई सुनवाई और जांच के बाद जीवित व्यक्ति को फिर से ‘जिंदा’ घोषित किया गया और उसका नाम खतौनी में बहाल करने का आदेश दिया गया।
यह मामला न केवल राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सरकारी अभिलेखों में एक छोटी सी चूक किसी व्यक्ति के अधिकारों और संपत्ति पर कितना बड़ा असर डाल सकती है।
उत्तराधिकार विवाद से खुली बड़ी गड़बड़ी
मामला बल्दीराय तहसील क्षेत्र के ग्राम गौहनिया मजरे हलियापुर का है, जहां कृषि भूमि के उत्तराधिकार को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। इस विवाद में देव आनंद और राम प्रसाद पक्ष आमने-सामने थे।
विवाद के दौरान अपीलकर्ता देव आनंद ने मृतक की पहचान को लेकर गंभीर सवाल उठाए। जांच में सामने आया कि वर्ष 2021 में तत्कालीन राजस्व निरीक्षक राम समुझ द्वारा पारित एक आदेश में बड़ी गलती हुई थी। उन्होंने राम प्रसाद और शिवपल्टन को एक ही व्यक्ति मान लिया था, जबकि दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे।
कागजों में मृत हो गए राम प्रसाद
राजस्व निरीक्षक की इस चूक का परिणाम यह हुआ कि जीवित राम प्रसाद सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित हो गए। इसके बाद भूमि से जुड़े उनके अधिकार प्रभावित होने लगे और जमीन पर उनका दावा भी कमजोर पड़ गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि चार वर्षों तक राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में यह गलती दर्ज रही, लेकिन किसी भी अधिकारी ने इसकी गंभीरता को समझते हुए मौके पर जांच करने की आवश्यकता नहीं समझी।
ग्रामीणों के बयान और स्थानीय जानकारी लगातार यह बताती रही कि राम प्रसाद और शिवपल्टन अलग-अलग व्यक्ति हैं, लेकिन सरकारी अभिलेखों में दोनों को एक ही मान लिया गया।
तहसीलदार की अदालत में खुली सच्चाई
मामला जब बल्दीराय तहसीलदार अरविंद तिवारी की अदालत पहुंचा तो विस्तृत सुनवाई की गई। अदालत ने गवाहों के बयान, ग्रामीणों की गवाही, मृत्यु प्रमाण पत्र, पुराने राजस्व अभिलेख और अन्य दस्तावेजों की गहन जांच कराई।
जांच के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि मृतक व्यक्ति शिवपल्टन था, जबकि राम प्रसाद पूरी तरह जीवित हैं और उनकी पहचान अलग है। सभी साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने पूर्व आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए उसे निरस्त कर दिया।
चार साल बाद मिला न्याय
तहसीलदार अरविंद तिवारी ने 27 फरवरी 2021 को पारित आदेश को रद्द करते हुए राम प्रसाद का नाम पुनः खतौनी में दर्ज करने के निर्देश दिए। इस फैसले के बाद चार वर्षों से सरकारी कागजों में ‘मृत’ चल रहे राम प्रसाद को आखिरकार न्याय मिला।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते यह गलती न पकड़ी जाती तो राम प्रसाद को अपनी पैतृक संपत्ति और कानूनी अधिकारों से वंचित होना पड़ सकता था।
सरकारी व्यवस्था पर उठे सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद राजस्व विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जमीन और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में अधिकारियों को दस्तावेजों के साथ-साथ मौके की वास्तविक स्थिति की भी जांच करनी चाहिए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक परेशान न होना पड़े।
बल्दीराय तहसील का यह मामला अब जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग इसे सरकारी फाइलों की लापरवाही का बड़ा उदाहरण मान रहे हैं।
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