सुलतानपुर में राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने उठाई शिक्षकों के भविष्य की चिंता, केंद्रीय शिक्षा मंत्री को भेजा पांच सूत्रीय मांग पत्र

सुलतानपुर। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, उत्तर प्रदेश की सुलतानपुर इकाई ने देशभर के लाखों शिक्षकों के भविष्य और सेवा सुरक्षा को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के नाम पांच सूत्रीय मांग पत्र प्रेषित किया है। यह ज्ञापन गुरुवार को जिलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से भेजा गया, जिसमें वर्ष 2010 से पूर्व विभिन्न राज्यों में नियुक्त शिक्षकों तथा उत्तर प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को विधायी एवं नीतिगत संरक्षण प्रदान करने की मांग की गई है।

महासंघ ने अपने ज्ञापन में कहा है कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा 23 अगस्त 2010 को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को शिक्षक नियुक्ति के लिए न्यूनतम अर्हता के रूप में अधिसूचित किया गया था। इसके बाद विभिन्न राज्यों में इस नियम को लागू किया गया। उत्तर प्रदेश में टीईटी की अनिवार्यता 27 जुलाई 2011 से प्रभावी हुई।

महासंघ ने अपने ज्ञापन में उल्लेख किया कि 29 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए पूर्व के निर्णय को यथावत बनाए रखा गया। इस निर्णय के बाद देश के उन लाखों शिक्षकों में चिंता और असुरक्षा का माहौल पैदा हो गया है, जो टीईटी नियम लागू होने से पहले ही पूर्ण योग्यता एवं तत्कालीन नियमों के अनुरूप नियुक्त होकर वर्षों से शिक्षण कार्य कर रहे हैं।

महासंघ का कहना है कि ऐसे शिक्षकों ने अपनी नियुक्ति के समय लागू सभी नियमों एवं पात्रताओं को पूरा किया था और उनकी नियुक्तियां पूरी तरह वैध थीं। इसलिए बाद में बनाए गए पात्रता मानदंडों को पूर्व प्रभाव से लागू करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के जिलाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह और जिला महामंत्री सतीश कुमार पाण्डेय ने भारतीय विधिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी कानून, नियम अथवा नीति सामान्यतः उसके लागू होने की तिथि से प्रभावी होती है। इसे पूर्व प्रभाव से लागू करना प्राकृतिक न्याय, समानता और विधिक निश्चितता के सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि दशकों से शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान देने वाले शिक्षकों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न होना न केवल उनके अधिकारों का हनन है बल्कि शिक्षा व्यवस्था के लिए भी चिंताजनक विषय है।

महासंघ ने मांग की है कि देश के विभिन्न राज्यों में 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षकों तथा उत्तर प्रदेश में 27 जुलाई 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से स्थायी रूप से मुक्त किया जाए। साथ ही ऐसे शिक्षकों की सेवा, वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतनमान, पेंशन तथा अन्य सभी वैधानिक और सेवा संबंधी लाभों को पूर्ण संरक्षण प्रदान किया जाए, ताकि उनके अधिकारों और भविष्य पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि यदि आवश्यकता हो तो संसद में उपयुक्त विधायी संशोधन अथवा विशेष प्रावधान लाकर इस शिक्षक वर्ग को स्थायी राहत प्रदान की जाए। महासंघ का कहना है कि इससे लाखों शिक्षकों में व्याप्त असुरक्षा की भावना समाप्त होगी और शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता बनी रहेगी।

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Suyash Chitranshi
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