- अगर सुरक्षा मानकों का पालन होता तो बच सकती थीं 15 जानें, भ्रष्टाचार और लापरवाही ने ली मासूम जिंदगियां: अशोक सिंह बिसेन
- सुलतानपुर बार एसोसिएशन के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट अशोक सिंह बिसेन ने उच्चस्तरीय जांच और जवाबदेही तय करने की मांग उठाई
सुलतानपुर। लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण कोचिंग अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे में 15 छात्र-छात्राओं की जान चली गई, जिससे न केवल उनके परिवारों के सपने बिखर गए बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और भवन सुरक्षा मानकों पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस त्रासदी को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में गहरा आक्रोश देखने को मिल रहा है।
सुलतानपुर बार एसोसिएशन के वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य एडवोकेट अशोक सिंह बिसेन ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे प्रशासनिक उदासीनता और सुरक्षा मानकों की अनदेखी का परिणाम बताया है। उनका कहना है कि यदि संबंधित विभागों और जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते भवन सुरक्षा और अग्निशमन व्यवस्था की गंभीरता से जांच की होती, तो इतनी बड़ी जनहानि को रोका जा सकता था।
एडवोकेट अशोक सिंह बिसेन ने कहा कि जिन परिवारों ने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए कोचिंग संस्थानों में भेजा था, आज वही परिवार अपने बच्चों को खोने के दुख में रो रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। जिन छात्रों के कंधों पर परिवारों की उम्मीदें थीं, वे कुछ ही मिनटों में आग की लपटों का शिकार हो गए।
कोचिंग संस्थानों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर उठाए सवाल
अशोक सिंह बिसेन ने बताया कि प्रदेश के अनेक कोचिंग संस्थानों में आज भी सुरक्षा मानकों का समुचित पालन नहीं हो रहा है। कई भवनों में पर्याप्त अग्निशमन यंत्र नहीं हैं, जबकि आपातकालीन स्थिति में सुरक्षित निकासी के लिए आवश्यक इंतजाम भी नदारद हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थानों को संचालित करने की अनुमति कैसे मिल जाती है, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। उनका कहना है कि यदि क्षमता के अनुरूप अग्निशमन उपकरण, नियमित सुरक्षा ऑडिट और आपातकालीन निकासी व्यवस्था सुनिश्चित की जाती, तो शायद 15 मासूम जिंदगियों को बचाया जा सकता था। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कागजी कार्रवाई और वास्तविक सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा अंतर है।
2016 में भवन गिराने के आदेश के बावजूद कैसे संचालित होता रहा कोचिंग संस्थान?
एडवोकेट बिसेन ने यह भी दावा किया कि जिस भवन में यह हादसा हुआ, उसे वर्ष 2016 में गिराने के आदेश दिए गए थे। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है, तो यह मामला और भी गंभीर हो जाएगा। उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि जब भवन को असुरक्षित माना जा चुका था, तब उसमें कोचिंग संस्थान का संचालन कैसे जारी रहा। उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रकरण में संबंधित अधिकारियों, भवन स्वामियों और संस्थान संचालकों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। केवल औपचारिक कार्रवाई या मुआवजे की घोषणा से पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिलेगा।
मथुरा बोर्ड कांड से की तुलना, भ्रष्टाचार पर साधा निशाना
अशोक सिंह बिसेन ने इस दर्दनाक घटना की तुलना पूर्व में हुए मथुरा बोर्ड कांड से करते हुए कहा कि दोनों हादसे व्यवस्था की विफलता और प्रशासनिक लापरवाही की एक जैसी तस्वीर पेश करते हैं। उनका कहना है कि जब तक भ्रष्टाचार, नियमों की अनदेखी और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक ऐसे हादसे बार-बार निर्दोष लोगों की जान लेते रहेंगे। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों के आर्थिक लाभ और विभागीय मिलीभगत की कीमत आम नागरिकों को अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ती है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और शासन-प्रशासन को इससे गंभीर सबक लेने की आवश्यकता है।
उच्चस्तरीय जांच पर उठे सवाल, दोषियों पर कार्रवाई की मांग
उन्होंने आगे कहा कि घटना के बाद प्रदेश सरकार द्वारा उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन जनता और पीड़ित परिवारों के मन में यह आशंका भी बनी हुई है कि कहीं यह जांच केवल कागजी कार्रवाई बनकर न रह जाए और कुछ कर्मचारियों पर जिम्मेदारी डालकर पूरे मामले को रफा-दफा न कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में इस भीषण हादसे के पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाना चाहती है, तो जांच पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए तथा दोषी चाहे किसी भी पद या स्तर पर हों, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। एडवोकेट बिसेन ने कहा कि जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को खोया है, उनके दर्द और नुकसान की भरपाई कभी नहीं की जा सकती, लेकिन दोषियों को सजा मिलने से पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने का एहसास अवश्य होगा।
प्रदेशभर में सुरक्षा ऑडिट और जवाबदेही तय करने की मांग
भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए श्री बिसेन ने कहा कि लखनऊ अलीगंज जैसी त्रासदी पूरे प्रदेश के लिए एक चेतावनी है। ऐसे में प्रदेशभर में संचालित सभी कोचिंग संस्थानों, विद्यालयों और अन्य सार्वजनिक भवनों की सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक एवं निष्पक्ष ऑडिट कराया जाना चाहिए। यह प्रक्रिया केवल एक बार की कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि नियमित अंतराल पर सुरक्षा मानकों की समीक्षा और निरीक्षण किया जाता रहे। उन्होंने मांग की कि अग्निशमन विभाग, स्थानीय प्रशासन और भवन विकास प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली की भी समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा हो, ताकि सुरक्षा नियमों के पालन में किसी प्रकार की लापरवाही या भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे। यदि इस हादसे से सबक लेकर प्रभावी कदम उठाए जाते हैं, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है और अनेक परिवारों को इस तरह के असहनीय दुख से बचाया जा सकता है।
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