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सातवीं मोहर्रम पर गूंजी ‘या हुसैन’ की सदाएं, ताजखानपुर से निकला रिवायती जुलूस-ए-अज़ा

सुलतानपुर। जिले में सातवीं मोहर्रम के अवसर पर धार्मिक आस्था, श्रद्धा और अनुशासन का अद्भुत संगम देखने को मिला। ताजखानपुर इमामबारगाह से अज़ीम अकीदत और पारंपरिक अंदाज़ के साथ जुलूस-ए-अज़ा बरामद हुआ, जिसमें ताजखानपुर, महमूदखानी, अफलेपुर और बहादुरपुर के अज़ादार बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूरे क्षेत्र में “या हुसैन” की सदाएं गूंजती रहीं और लोगों ने कर्बला के शहीदों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया।

सातवीं मोहर्रम का दिन इस्लामी इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इस अवसर पर आयोजित मजलिसों में ज़ाकिरों और धर्मगुरुओं ने कर्बला की उस दर्दनाक घटना का विस्तार से उल्लेख किया, जब 61 हिजरी में यज़ीदी लश्कर ने हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके अहल-ए-बैत पर दरिया-ए-फ़रात का पानी बंद कर दिया था। वक्ताओं ने बताया कि यह दिन ‘सुकूत-ए-आब’ यानी पानी बंद होने के दिन के रूप में याद किया जाता है, जो सब्र, कुर्बानी और इंसाफ के लिए संघर्ष का संदेश देता है।

मजलिसों के दौरान वक्ताओं ने बताया कि सातवीं मोहर्रम 61 हिजरी को यज़ीदी सेना के सिपहसालार इब्न-ए-साद ने हुक्म जारी किया था कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों को पानी न पहुंचने दिया जाए। इसके लिए फ़रात नदी पर कड़ा पहरा बिठा दिया गया था। परिणामस्वरूप ख़ेमों में मौजूद मासूम बच्चों और महिलाओं तक को पानी से महरूम होना पड़ा।

धार्मिक वक्ताओं ने कहा कि बीबी सकीना (स.अ.) और मासूम अली असग़र (अ.स.) प्यास की शिद्दत से बेहाल हो गए थे। हज़रत अब्बास (अ.स.) ने कई बार मश्क लेकर पानी लाने का प्रयास किया, लेकिन दुश्मनों के कड़े पहरे और हमलों के कारण पानी शिविर तक नहीं पहुंच सका। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में सातवीं मोहर्रम को विशेष रूप से मनाया जाता है।

ताजखानपुर इमामबारगाह से निकला जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से होता हुआ चारों गांवों की इमामबारगाहों तक पहुंचा। जुलूस के दौरान अज़ादारों ने नौहाख्वानी और मातम के माध्यम से कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। रास्ते भर धार्मिक अनुशासन और श्रद्धा का वातावरण बना रहा। जुलूस मार्ग पर जगह-जगह अकीदतमंदों की ओर से सबीलें लगाई गईं। श्रद्धालुओं को शरबत, ठंडा पानी और तबर्रुक वितरित किया गया। भीषण गर्मी के बीच यह व्यवस्था लोगों के लिए राहत का माध्यम बनी और मोहर्रम के संदेश को भी मजबूत करती दिखाई दी।

जुलूस जब दमगड़िया चौराहे पर पहुंचा तो वहां विभिन्न अंजुमनों ने अपने पारंपरिक अंदाज़ में नौहाख्वानी और मातम किया। अंजुमन असगरिया ताजखानपुर, अंजुमन लश्करे हुसैन अफलेपुर और अंजुमन अब्बासिया बहादुरपुर समेत कई अंजुमनों ने कर्बला के शहीदों की याद में पुरसा पेश किया। इस दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी मौजूद रहे। धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल लोगों ने कहा कि कर्बला की घटना केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि इंसाफ, मानवता और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है।

मोहर्रम के जुलूस को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। पुलिस अधीक्षक चारु निगम के निर्देशन में पूरे मार्ग पर पुलिस बल तैनात रहा। संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी गई और जुलूस की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी गई।

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Suyash Chitranshi
Suyash Chitranshi